उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab wo mere isbaat se inkar ko samjha

जब वो मिरे इसबात से इंकार को समझा

جب وہ مرے اثبات سے انکار کو سمجھا

शायर: Parveen Sultana Saba8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब वो मिरे इसबात से इंकार को समझा
तब ही तो हक़ीक़त में मिरे प्यार को समझा

जब ख़त्म तमाशा हुआ ताली तो बजी ख़ूब
लेकिन न कोई मरकज़ी किरदार को समझा

जिस वक़्त अदालत ने बरी कर दिए क़ातिल
तब ज़ेहन-ए-रसा ना'रा-ए-दीवार को समझा

रोटी भी खिलाई तो मुझे कासा-ब-कफ़ ने
बाक़ी न कोई भूक की गुफ़्तार को समझा

ये रौंद के आगे ही चली जाती है सब को
गर आप ने दुनिया की न रफ़्तार को समझा

वो दूसरी दुनिया का मकीं हो गया जा कर
जब तक कि मसीहा मिरे बीमार को समझा

कर दी लब-ओ-रुख़्सार की लाली नज़र-अंदाज़
तब जा के कहीं हुस्न के मेआ'र को समझा

दी दाद बहुत खुल के मुझे अहल-ए-सुख़न ने
लेकिन न 'सबा' आप के अशआ'र को समझा