उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jagti aankhon mein kaise KHwab dar aane lage

जागती आँखों में कैसे ख़्वाब दर आने लगे

جاگتی آنکھوں میں کیسے خواب در آنے لگے

शायर: Parvez Bazmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जागती आँखों में कैसे ख़्वाब दर आने लगे
रास्ते मेरी तरफ़ ले कर सफ़र आने लगे

दूर तक उड़ती अबाबीलों की डारें देख कर
ऊँघते पंछी के भी जुम्बिश में पर आने लगे

काएनात-ए-शब में चश्म-ए-जुस्तुजू भटकी फिरी
रौशनी के मंतक़े आख़िर नज़र आने लगे

कितनी दर्द-अंगेज़ थी सूनी मंडियों की पुकार
उड़ गए थे जो परिंदे लौट कर आने लगे

धज्जियाँ दामन की पहले ही नुमायाँ थीं बहुत
कुछ नए इल्ज़ाम भी अब मेरे सर आने लगे