उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ishq mein haara hua hun kaamrani kuchh nahin

'इश्क़ में हारा हुआ हूँ कामरानी कुछ नहीं

عشق میں ہارا ہوا ہوں کامرانی کچھ نہیں

शायर: Saarik Khan Saarik9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'इश्क़ में हारा हुआ हूँ कामरानी कुछ नहीं
मेरे हिस्सा में सनम की मेहरबानी कुछ नहीं

छोड़ कर तितली गई है जब से दिल के बाग़ को
दिल में बस वीरानियाँ हैं रुत सुहानी कुछ नहीं

कश्ती से बिछड़ा जो दरिया अब तलक सदमे में है
जम गई है बर्फ़ इस में और रवानी कुछ नहीं

आइने को हैरतें हैं हाल मेरा देख कर
दाग़ चेहरे पे है मेरे नौजवानी कुछ नहीं

ख़त जलाए मैं ने सारे जो दिए थे यार ने
पास मेरे उस की साहब अब निशानी कुछ नहीं

ख़ल्वतों के साए में हूँ यार इक मुद्दत से मैं
चार सू है बस उदासी शादमानी कुछ नहीं

डाकिया ही थे कबूतर पहले मोबाइल न था
बातें सारी ख़त से की थीं मुँह-ज़बानी कुछ नहीं

बिन तिरे कैसे कहूँ अब किस तरह बतलाऊँ मैं
साँस चलती है फ़क़त ये ज़िंदगानी कुछ नहीं

मुद्दतें गुज़री हैं 'सारिक़' यार को देखे हुए
क्या करें लब से बयाँ अब ख़ुश-बयानी कुछ नहीं