उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is gham ki dhup mein mujhe purwaiyan na do

इस ग़म की धूप में मुझे पुरवाइयाँ न दो

اس غم کی دھوپ میں مجھے پروائیاں نہ دو

शायर: Lalan Chaudhary7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस ग़म की धूप में मुझे पुरवाइयाँ न दो
जलने दो अपनी ज़ुल्फ़ की परछाइयाँ न दो

लर्ज़ां हैं दो-जहान क़यामत बपा न हो
अपने शु'ऊर-ए-हुस्न को अंगड़ाइयाँ न दो

आ जाओ कब से ख़ल्क़ तरसती है दीद को
पर्दे में अपने आप को तन्हाइयाँ न दो

हो जाए जिस में ग़र्क़ मिरी कश्ती-ए-उमीद
वो बहर-ए-इज़्तिराब की गहराइयाँ न दो

होती हैं कारगर कहीं झूटी तसल्लियाँ
ऐ चारासाज़ो दिल को शकेबाइयाँ न दो

रोज़-ए-अज़ल से है दिल-ए-वहशी जुनूँ-पसंद
मजनूँ को ज़ौक़-ए-अंजुमन-आराईयाँ न दो

'आफ़त' उठा लूँ हाथ न उस ज़ीस्त से कहीं
मेरे जुनून-ए-'इश्क़ को रुस्वाइयाँ न दो