उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is dar ki si rahat bhi do aalam mein kahin hai

इस दर की सी राहत भी दो आलम में कहीं है

اس در کی سی راحت بھی دو عالم میں کہیں ہے

शायर: Raaz Yazdani5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस दर की सी राहत भी दो आलम में कहीं है
जीना भी यहीं है मुझे मरना भी यहीं है

अब वाक़िफ़-ए-मफ़्हूम-ए-वफ़ा क़ल्ब-ए-हज़ीं है
अब आप की बेदाद भी बेदाद नहीं है

तुम और मिरी ख़ाना-ख़राबी पे तबस्सुम
उम्मीद से बढ़ कर अभी क़द्र-ए-दिल-ओ-दीं है

या तेरे सिवा हुस्न ही दुनिया में नहीं था
या देख रहा हूँ कि जो मंज़र है हसीं है

ये ज़ीस्त है या मौत समझ में नहीं आता
अब दर्द है और दर्द की तकलीफ़ नहीं है