उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ilzam kuchh na kuchh to mere sar bhi aaega

इल्ज़ाम कुछ न कुछ तो मिरे सर भी आएगा

الزام کچھ نہ کچھ تو مرے سر بھی آئے گا

शायर: Qaisar Siddiqi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इल्ज़ाम कुछ न कुछ तो मिरे सर भी आएगा
आँगन में पेड़ होगा तो पत्थर भी आएगा

सूरज के ग़ुस्ल करने का मंज़र भी आएगा
इन जंगलों के बा'द समुंदर भी आएगा

सामाँ जराहतों के भी हम साथ ले चलें
इस रास्ते में शहर-ए-सितमगर भी आएगा

वो साँप जिस को दूध पिलाती है दुश्मनी
थैली से एक रोज़ वो बाहर भी आएगा

पलकों पे अपनी ख़्वाब-ए-तजल्ली सजाइए
शाम आई है तो रात का लश्कर भी आएगा

जो साया खेलता है अभी मेरी गोद में
इक दिन वो मेरे क़द के बराबर भी आएगा

इस दोपहर की धूप को शायद ख़बर नहीं
सहरा में कोई मोम का पैकर भी आएगा

जब तुम नहीं तो उस का भी क्या काम है यहाँ
तुम आओगे तो बज़्म में 'क़ैसर' भी आएगा