उर्दू शायरी · ग़ज़ल

husn ki ranginiyan kya jalwa-saman ho gain

हुस्न की रंगीनियाँ क्या जल्वा-सामाँ हो गईं

حسن کی رنگینیاں کیا جلوہ ساماں ہو گئیں (ردیف .. ی)

शायर: Dattatriya Kaifi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुस्न की रंगीनियाँ क्या जल्वा-सामाँ हो गईं
दिल की आँखें सर-ब-सर ऐमन-ब-दामाँ हो गईं

तूर-सामानी 'अयाँ फ़ितरत की हर ज़र्रे से है
तेरी आँखें देख कर हर गुल को हैराँ हो गईं

जल्वा बे-पर्दा था फ़र्त-ए-शौक़ ने डाली नक़ाब
ये निगाहें मुज़्तरिब हो कर परेशाँ हो गईं

जिन उमीदों से बना था ख़ाना-ए-दिल रश्क-ए-गुल
अब वही इस घर की बर्बादी का सामाँ हो गई