उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har samt uDi gard mere shahr-e-guman mein

हर सम्त उड़ी गर्द मिरे शहर-ए-गुमाँ में

ہر سمت اڑی گرد مرے شہر گماں میں

शायर: Jafar Sahni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर सम्त उड़ी गर्द मिरे शहर-ए-गुमाँ में
महसूर तमन्ना है ज़माने के धुआँ में

सन्नाटे का जो क़िस्सा सुनाने में मगन है
रक़्साँ था कभी शोर उसी उजड़े मकाँ में

ख़ुशियों को बदन पर जो लपेटे हुए कल था
है आज शराबोर वही दर्द निहाँ में

मा'दूम हुआ गुल का निशाँ सहन-ए-चमन से
ख़ुश्बू है मगर अब भी बसी बाद-ए-रवाँ में

हर ख़्वाब की ता'बीर नज़र आई हिरासाँ
नापैद हुआ जोश-ए-जुनूँ मर्द-ए-जवाँ में

फ़र्दा की गली में वो बड़ा काम करेगी
इक ज़िद है खिलौने की जो मा'सूम फ़ुग़ाँ में

गुज़री हुई साअ'त को पलटने में लगा है
कुछ बात नज़र आई उसे कार-ए-ज़ियाँ में

पुर-कैफ़ हुई 'साहनी' हर साँस की आहट
मौहूम इशारा जो मिला वक़्त-ए-गिराँ में