उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har moD par fareb hi khana paDa mujhe

हर मोड़ पर फ़रेब ही खाना पड़ा मुझे

ہر موڑ پر فریب ہی کھانا پڑا مجھے

शायर: Aadil Shah9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर मोड़ पर फ़रेब ही खाना पड़ा मुझे
सच बोलने का बोझ उठाना पड़ा मुझे

क़िस्सा तुम्हारी याद का जब भी छिड़ा कहीं
महफ़िल से उठ के दूर ही जाना पड़ा मुझे

वो ख़्वाब जिस की कोई भी ता'बीर ही न थी
बोझ उस का 'उम्र भर ही उठाना पड़ा मुझे

इक नाम था जो दिल की लकीरों में क़ैद था
अपने ही हाथों उस को मिटाना पड़ा मुझे

कुछ ऐसे भी मक़ाम मिले राह-ए-'इश्क़ में
पत्थर की तरह ख़ुद को बनाना पड़ा मुझे

पूछा किसी ने हँस के जो बर्बादी का सबब
अपना ही नाम सब को बताना पड़ा मुझे

मैं काँच का मकान था पत्थर के शहर में
हर ज़ख़्म अपने दिल में छुपाना पड़ा मुझे

अपने ही 'अक्स से मुझे वहशत सी हो गई।
आईना अपने घर से हटाना पड़ा मुझे

'आदिल' गुनाह-गार था शर्मिंदा हो गया
सज्दों में अपने रब को मनाना पड़ा मुझे