उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamare zehn mein mahshar bapa hai kya kiya jae

हमारे ज़ेहन में महशर बपा है क्या किया जाए

ہمارے ذہن میں محشر بپا ہے کیا کیا جائے

शायर: Qaisar Siddiqi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमारे ज़ेहन में महशर बपा है क्या किया जाए
ये दिल आमादा-ए-तर्क-ए-वफ़ा है क्या किया जाए

मुसलसल बारिश-ए-संग-ए-सदा है क्या किया जाए
यही मेरी वफ़ाओं का सिला है क्या किया जाए

लबों तक आ के सब हर्फ़-ए-शिकायत टूट जाते हैं
अजब अंदाज़ से वो देखता है क्या किया जाए

बिछड़ कर आप से जीने की ख़्वाहिश कुफ़्र है लेकिन
हमारी ज़िंदगी ही बे-हया है क्या किया जाए

ये माना ख़्वाब है ऐ ज़ख़्म-ए-नौ तेरी ख़लिश लेकिन
यहाँ पहले ही इक मेला लगा है क्या किया जाए

हमेशा सोचते रहना भी कुछ अच्छा नहीं होता
मगर शाइ'र हमेशा सोचता है क्या किया जाए

वो इंसाँ जो मिरा हमराज़ है हम-ज़ाद है 'क़ैसर'
वो मुझ से आज तक ना-आश्ना है क्या किया जाए