उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum wo majbur ki hijrat bhi nahin kar sakte

हम वो मजबूर कि हिजरत भी नहीं कर सकते

ہم وہ مجبور کہ ہجرت بھی نہیں کر سکتے

शायर: Danish Asari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस शीर्षक की यह संग्रह प्रविष्टि 2 है। समान शीर्षक के रिकॉर्ड में पाठ या श्रेय का अंतर है; इसे स्वतंत्र आधिकारिक संस्करण का दावा न मानें। अन्य संग्रह प्रविष्टि 1

हम वो मजबूर कि हिजरत भी नहीं कर सकते
या'नी आज़ादी की चाहत भी नहीं कर सकते

अपने का'बे पे तो क़ब्ज़ा है अज़ाज़ीलों का
हम तो अब खुल के इबादत भी नहीं कर सकते

तुर्किया मस्त-ए-मय-ए-नाब अरब मस्त-ए-मआश
अब तो वो मेरी हिमायत भी नहीं कर सकते

क़ातिलो ठहरो ज़रा एक तो सज्दा कर लूँ
क्या ज़रा सी ये रिआ'यत भी नहीं कर सकते

जो भी था सब तो लुटा डाला है हज़रत अब क्या
आप अब और सख़ावत भी नहीं कर सकते

नाम रक्खा है मुसलमानों सा मर जाओ कि तुम
क़ौम-ए-मुस्लिम से बराअत भी नहीं कर सकते

'दानिश-असरी’ ने बताई थी तुम्हें कल की ख़बर
तुम तो अब उस से शिकायत भी नहीं कर सकते