उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum apni fikr ka chehra badal ke dekhte hain

हम अपनी फ़िक्र का चेहरा बदल के देखते हैं

ہم اپنی فکر کا چہرہ بدل کے دیکھتے ہیں

शायर: Qaisar Siddiqi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम अपनी फ़िक्र का चेहरा बदल के देखते हैं
तिलिस्म ख़्वाब से बाहर निकल के देखते हैं

सुना ये है कि बहुत तेज़ गाम हो तुम लोग
तुम्हारे साथ ज़रा हम भी चल के देखते हैं

उठा के चाँद सितारों को सर पे देख चुके
हम अपने माथे पे अब ख़ाक मल के देखते हैं

ज़रा पता तो चले हुस्न-ए-अहद-ए-नौ क्या है
नई निगाह के साँचे में ढल के देखते हैं

नई हयात की तस्वीर देखने वाले
हद-ए-निगाह से आगे निकल के देखते हैं

ये कैसे दोस्त हैं पूछे तो कोई उन से ज़रा
सँभालते नहीं लेकिन सँभल के देखते हैं

यहाँ वहाँ तो बहुत जल चुके मियाँ 'क़ैसर'
अब अपने दिल की समाधी पे जल के देखते हैं