उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hain dhabbe tegh-e-qatil ke jise dhone nahin dete

हैं धब्बे तेग़-ए-क़ातिल के जिसे धोने नहीं देते

ہیں دھبے تیغ قاتل کے جسے دھونے نہیں دیتے

शायर: Habeeb Aarvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हैं धब्बे तेग़-ए-क़ातिल के जिसे धोने नहीं देते
मिरे अहबाब तजदीद-ए-वफ़ा होने नहीं देते

मिरी वहशत के साए झाँकते रहते हैं रौज़न से
ये आदम-ख़ोर मुझ को रात-भर सोने नहीं देते

शिकस्त-ए-आरज़ू रुसवाई-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र पैहम
यही हालात मुझ को आप का होने नहीं देते

तक़ाज़ा-ए-वफ़ा में भी सितम का एक पहलू है
मैं रोना चाहता हूँ और वो रोने नहीं देते

'हबीब' अपनी ख़ता थी हो गए रुस्वा ज़माने में
कि हम सेहन-ए-चमन में बिजलियाँ बोने नहीं देते