उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek masum tamanna ki faza thi kal tak

एक मा'सूम तमन्ना की फ़ज़ा थी कल तक

ایک معصوم تمنا کی فضا تھی کل تک

शायर: Jafar Sahni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक मा'सूम तमन्ना की फ़ज़ा थी कल तक
ज़िंदगी ऐसी कहाँ होश-रुबा थी कल तक

ग़ैज़ आँधी का बना अब है मुक़द्दर मेरा
दिल के आँगन में महकती सी सबा थी कल तक

नग़्मगी आ गई किस तौर से उस के लब पर
जिस की आवाज़ तरन्नुम से जुदा थी कल तक

आज ख़ामोश बहुत बज़्म-ए-बहाराँ क्यूँ है
गुनगुनाते से लिबादे में हवा थी कल तक

हुस्न की शोख़-नज़र माँगे है क़ीमत अपनी
झुकती आँखों के दरीचे में हया थी कल तक

ये जो हंगामों से मरबूत है महफ़िल मेरी
कैफ़-ज़ा दिल-रुबा बुलबुल की सदा थी कल तक

सर-निगूँ वक़्त के क़दमों में है ख़्वाहिश अपनी
वर्ना हर साँस में इक मौज-ए-अना थी कल तक

अब कहाँ शौक़ को मिलता है बढ़ावा 'जाफ़र'
नर्म पलकों में घुली एक अदा थी कल तक