उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dur kuchh ahl-e-junun ki be-qarari kijiye

दूर कुछ अहल-ए-जुनूँ की बे-क़रारी कीजिए

دور کچھ اہل جنوں کی بے قراری کیجیے

शायर: Nabeel Ahmad Nabeel8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दूर कुछ अहल-ए-जुनूँ की बे-क़रारी कीजिए
हो सके तो उन की थोड़ी ग़म-गुसारी कीजिए

जिन के बिस्तर से नहीं जाती कोई सिलवट कभी
उन की आँखों में वफ़ा के ख़्वाब जारी कीजिए

'इश्क़ की क़िस्मत यही है 'इश्क़ का मंसब यही
जागिए शब-भर यूँही अख़्तर-शुमारी कीजिए

नोचिए ज़ख़्म-ए-जिगर को आँख भर कर रोइए
और कब तक हिज्र में यूँ आह-ओ-ज़ारी कीजिए

भेजिए कोई बुलावा कोई चिट्ठी भेजिए
अपने उन परदेसियों से शहर-दारी कीजिए

लोग हैं तय्यार हिजरत के लिए इस शहर से
फिर कोई ताज़ा नया फ़रमान जारी कीजिए

काम आएगा न कोई मुश्किलों में देखना
जिस क़दर भी दोस्तों से वज़'-दारी कीजिए

आएगा कब साँस वर्ना दूसरा तुझ को 'नबील'
दिल के ज़ख़्मों की न ऐसे पर्दा-दारी कीजिए