उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dekh to dil ki jaan se uThta hai

देख तो दिल कि जाँ से उठता है

دیکھ تو دل کہ جاں سے اٹھتا ہے

शायर: Meer Taqi Meer9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

गोर किस दिलजले की है ये फ़लक
शोला इक सुब्ह याँ से उठता है

ख़ाना-ए-दिल से ज़ीनहार न जा
कोई ऐसे मकाँ से उठता है

नाला सर खींचता है जब मेरा
शोर इक आसमाँ से उठता है

लड़ती है उस की चश्म-ए-शोख़ जहाँ
एक आशोब वाँ से उठता है

सुध ले घर की भी शोला-ए-आवाज़
दूद कुछ आशियाँ से उठता है

बैठने कौन दे है फिर उस को
जो तिरे आस्ताँ से उठता है

यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है

इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है