उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bah rahi hai phir wahi purwa suhani raat mein

बह रही है फिर वही पुर्वा सुहानी रात में

بہہ رہی ہے پھر وہی پروا سہانی رات میں

शायर: Updesh Vidyarthi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बह रही है फिर वही पुर्वा सुहानी रात में
चल पड़ी है स्वप्न की फिर राजधानी रात में

लौट आया है मिरा बचपन दुबारा फिर वही
फिर सुनाएँगी मुझे दादी कहानी रात में

फिर लुटेगा दिल किसी का देखना आकाश में
बढ़ रही है चाँद की फिर नित जवानी रात में

फिर सितारों की कोई बारात निकलेगी यहाँ
फिर उतर आएँगी परियाँ आसमानी रात में

फिर चमकने लग गए जुगनू मिरे अतराफ़ में
फिर से मिलने आ गई पागल दीवानी रात में

फिर कमल खिलने लगे हैं गाँव के तालाब में
फिर महकने लग गई है रात-रानी रात में

छोटी-मोटी बात पर लड़ना-झगड़ना रोज़ ही
दिन की सारी दुश्मनी फिर भूल जानी रात में

और सुनना है अगर 'उपदेश' आना गाँव में
फिर सुनाएँगे कभी बाक़ी कहानी रात में