उर्दू शायरी · ग़ज़ल

badla mizaj-e-husn to wo ru-ba-ru nahin

बदला मिज़ाज-ए-हुस्न तो वो रू-ब-रू नहीं

بدلا مزاج حسن تو وہ رو بہ رو نہیں

शायर: Qaisar Usmani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बदला मिज़ाज-ए-हुस्न तो वो रू-ब-रू नहीं
वो इश्वा-ओ-अदा नहीं वो गुफ़्तुगू नहीं

दिल से तुझे निकाल के कुछ मुतमइन तो हूँ
फिर भी कहूँ ये कैसे तिरी जुस्तुजू नहीं

ख़ुशबू न जिन की फैले फ़ज़ाओं में चार-सू
गुलशन में ऐसे फूलों की कुछ आबरू नहीं

जब से निज़ाम-ए-मय-कदा बदला है दोस्तो
वो मय नहीं वो जाम नहीं वो सुबू नहीं

चर्चे वो दोस्तों ने दिए हैं कि अल-अमाँ
अब राह-ओ-रस्म की भी मुझे आरज़ू नहीं

'क़ैसर' हर इक तरफ़ है गिरानी का तज़्किरा
लेकिन ज़रा बताइए सस्ता लहू नहीं