उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aur hi kahin Thahre aur hi kahin pahunche

और ही कहीं ठहरे और ही कहीं पहुँचे

اور ہی کہیں ٹھہرے اور ہی کہیں پہنچے

शायर: Ikram Mujeeb5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

और ही कहीं ठहरे और ही कहीं पहुँचे
जिस जगह पहुँचना था हम वहाँ नहीं पहुँचे

हिज्र की मसाफ़त में साथ तू रहा हर दम
दूर हो गए तुझ से जब तिरे क़रीं पहुँचे

ताएर-ए-तलब की है हर उड़ान उस दर तक
ना-मुराद दिल का हर रास्ता वहीं पहुँचे

रुख़ करे इधर का ही हर अज़ाब दुनिया का
आसमाँ से जो उतरे वो बला यहीं पहुँचे

हर दिल ओ नज़र में हो इक निखार सा पैदा
बद-गुमान ज़ेहनों तक नेमत-ए-यक़ीं पहुँचे