उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajab bhul o hairat jo maKHluq ko hai

अजब भूल ओ हैरत जो मख़्लूक़ को है

عجب بھول و حیرت جو مخلوق کو ہے

शायर: Yasin Ali Khan Markaz9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजब भूल ओ हैरत जो मख़्लूक़ को है
ख़ुदा की तलब शिर्क की जुस्तुजू है

शराब-ए-मोहब्बत में मख़मूर हूँ मैं
पियाला भरा है मुलब्बब सुबू है

पता एक का दो में क्यूँ कर मिलेगा
जो कसरत फ़ना हो तो ख़ुद तू ही तू है

नहीं ग़ैर कोई तशख़्ख़ुस का पर्दा
मन-ओ-तू फ़क़त ग़ैर की गुफ़्तुगू है

है ख़ुद आप मौजूद हर यक सिफ़त से
जुदाई नहीं इस में कुछ मू-ब-मू है

सिफ़त बस्त-ओ-क़ाबिज़ की तुख़्म-ओ-शजर है
जो बू है सो गुल है जो गुल है सो बू है

वो पीर-ए-तरीक़त है कामिल उसी को
ख़ुदा इस के हर आन में रू-ब-रू है

वजूद एक है सूरत उस की मुग़य्यर
है जल्वा उसी का न मैं और तू है

तू 'मरकज़' है आलम में पैदा-ओ-ज़ाहिर
बनाया बनाता है जो कुछ कि तू है