बाग़-ए-जन्नत के हैं बेहरे मदह़-ख़्वान-ए-अहल-ए-बैततुम को मुज़्दा नार का, ए ! दुश्मनान-ए-अहल-ए-बैत
किस ज़बां से हो बयान-ए-इज़्ज़-ओ-शान-ए-अहल-ए-बैतमदह़-गो-ए-मुस्तफ़ा हैं मदह-ख़्वान-ए-अहल-ए-बैत
उनकी पाकी का ख़ुदा-ए-पाक करता है बयानआया-ए-तत़हीर से ज़ाहिर है शान-ए-अहल-ए-बैत
मुस्तफ़ा इज़्ज़त बड़ाने के लिये तअ़ज़ीम देंहै बुलंद इक़बाल तेरा दूदमान-ए-अहल-ए-बैत
उन के घर तो बे-इजाज़त जिब्रईल आते नहींक़द्र वाले जानते हैं क़द्र-ओ-शान-ए-अहल-ए-बैत
फूल ज़ख्मों के खिलाए हैं हवा-ए-दोस्त नेख़ून से सींचा गया है गुल्सितान-ए-अहल-ए-बैत
अहल-ए-बैत-ए-पाक से गुस्ताख़ियां बे-बाकियांलअ़नतुल्लाहि-अ़लयकुम दुश्मनान-ए-अहल-ए-बैत
बे-अदब गुस्ताख़ फ़िरक़े को सुना दे ए हसनयूं कहा करते हैं सुन्नी दास्तान-ए-अहल-ए-बैत
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