उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye takalluf ye mudaraat samajh mein aae

ये तकल्लुफ़ ये मुदारात समझ में आए

یہ تکلف یہ مدارات سمجھ میں آئے

शायर: Ibrat Machlishahri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये तकल्लुफ़ ये मुदारात समझ में आए
हो जुदाई तो मुलाक़ात समझ में आए

रूह की प्यास फुवारों से कहीं बुझती है
टूट के बरसे तो बरसात समझ में आए

जागते लब मिरे और उस की झपकती आँखें
नींद आए तो कहाँ बात समझ में आए

ली थी मौहूम तहफ़्फ़ुज़ के घरौंदे में पनाह
रेत जब बिखरी तो हालात समझ में आए

उँगलियाँ जिस्म के सब ऐब-ओ-हुनर जानती हैं
लम्स जागे तो इक इक बात समझ में आए

सैकड़ों हाथ मिरे क़त्ल में ठहरे हैं शरीक
एक दो हों तो कोई बात समझ में आए

कभी उतरा ही नहीं उस के तकल्लुफ़ का लिबास
हो बरहना तो मुलाक़ात समझ में आए

कोई आसाँ नहीं जल जल के सहर कर लेना
शम्अ बन जाओ तो फिर रात समझ में आए

तुम किसी रेत के टीले पे खड़े हो 'इबरत'
उठ्ठे तूफ़ाँ तो फिर औक़ात समझ में आए