उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye jo tum dekh rahe ho KHas-o-KHashak pe KHak

ये जो तुम देख रहे हो ख़स-ओ-ख़ाशाक पे ख़ाक

یہ جو تم دیکھ رہے ہو خس و خاشاک پہ خاک

शायर: Tabassum Siddiqui7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये जो तुम देख रहे हो ख़स-ओ-ख़ाशाक पे ख़ाक
इस से बढ़ कर है मिरी ख़्वाहिश-ए-सद-चाक पे ख़ाक

गर कोई ख़्वाब नहीं है मिरी आँखों में तो फिर
मेरे सामान पे हसरत मिरी इम्लाक पे ख़ाक

मैं ने उड़ने ही नहीं दी है रह-ए-इश्क़ में गर्द
मैं ने पड़ने ही नहीं दी तिरी पोशाक पे ख़ाक

निस्बत-ए-ख़ाक पे शर्मिंदगी क्यों हो मुझ को
दस्तकें देती है जा कर दर-ए-लौलाक पे ख़ाक

ये जो तख़सीस-ए-ज़न-ओ-मर्द है ये वहम है बस
तुम मुझे देखना जब पहुँचे मिरी चाक पे ख़ाक

ये जो है आदमी का अज़्म-ए-सफ़र इस के तुफ़ैल
नज़र आएगी किसी दिन रह-ए-अफ़्लाक पे ख़ाक

यूँ भी तुम क्या हो फ़क़त ख़ाक 'तबस्सुम' बीबी
और फिर बैठनी है आ के कल इस ख़ाक पे ख़ाक