उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yas ki kohr mein lipTa hua chehra dekha

यास की कोहर में लिपटा हुआ चेहरा देखा

یاس کی کہر میں لپٹا ہوا چہرہ دیکھا

शायर: Bagh Husain Kamal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यास की कोहर में लिपटा हुआ चेहरा देखा
जिस्म का एक बिगड़ता हुआ ख़ाका देखा

अपनी सूरत भी न पहचान सकी आँख मिरी
मुद्दतों ब'अद जो मैं ने कभी शीशा देखा

शहर-ए-पुर-हौल में अब के ये 'अजब मंज़र था
संग कुशादा था मगर संग को बस्ता देखा

मैं भी गुम-सुम था कोई बात न करने पाया
उस के होंटों पे भी जैसे कोई पहरा देखा

तेरा क़ुर्ब एक तमन्ना सो तमन्ना ही रही
हासिल-ए-'उम्र यही है तिरा रस्ता देखा

क्या 'अजब राख से पैदा हो कोई क़स्र-ए-अज़ीम
हम ने आतिश में भी गुलज़ार का नक़्शा देखा

मैं ही ग़मगीन नहीं तर्क-ए-त'अल्लुक़ पे 'कमाल'
वो भी नाशाद था उस को भी फ़सुर्दा देखा