उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo zaKHm phir se hara hai nishan na tha jis ka

वो ज़ख़्म फिर से हरा है निशाँ न था जिस का

وہ زخم پھر سے ہرا ہے نشاں نہ تھا جس کا

शायर: Yasmeen Habeeb5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो ज़ख़्म फिर से हरा है निशाँ न था जिस का
हुई है रात वो बारिश गुमाँ न था जिस का

हवाएँ ख़ुद उसे साहिल पे ला के छोड़ गईं
वो एक नाव कोई बादबाँ न था जिस का

कशीद करता रहा हिजरतों से दर्द की मय
कोई तो था कि कहीं हम-ज़बाँ न था जिस का

इसी के दम से थी रौनक़ तमाम बस्ती में
कि ख़ंदा-लब था मगर ग़म अयाँ न था जिस का

जली तो यूँ कि हुआ राख अंग अंग मिरा
अजीब आग थी कोई धुआँ न था जिस का