उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo andalib hun ki sada mujhko gham raha

वो 'अंदलीब हूँ कि सदा मुझ को ग़म रहा

وہ عندلیب ہوں کہ صدا مجھ کو غم رہا

शायर: Captain Damingo Paul Lizwa6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो 'अंदलीब हूँ कि सदा मुझ को ग़म रहा
बाग़-ए-जहाँ में नख़्ल-ए-तमन्ना क़लम रहा

वहशी वो हूँ कि हद्द-ए-अदम से न बढ़ गया
सहरा में क़ैस का मैं क़दम-दर-क़दम रहा

मंज़ूर उन को साफ़ हैं वा'दा-ख़िलाफ़ियाँ
ऐ इंतिज़ार क्यों मिरी आँखों में दम रहा

अक्सर मिरी ग़ज़ल में जो नुक्ते हैं रम्ज़ हैं
'आजिज़ जभी सना में हर अहल-ए-क़लम रहा

'आदत सुजूद की जो थी 'अहद-ए-शबाब में
पीरी में भी सदा क़द-ए-आ'शिक़ में ख़म रहा

ज़र्रा नई ग़ज़ल कही 'यकता' के फ़ैज़ से
गो दर्द-ए-मश्क़-ए-शे'र-ओ-सुख़न तुझ को कम रहा