उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wahi sham ke dilase wahi subh ke bahane

वही शाम के दिलासे वही सुब्ह के बहाने

وہی شام کے دلاسے وہی صبح کے بہانے

शायर: Faheem Jogapuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वही शाम के दिलासे वही सुब्ह के बहाने
शब-ए-तार से फ़राग़त मिले कब ख़ुदा ही जाने

कहाँ वो ख़फ़ा ख़फ़ा थे कहाँ आ गए मनाने
मिरी जीत बन गए हैं मिरी हार के ज़माने

नहीं फ़स्ल-ए-गुल का शैदा मिरी ख़्वाहिशों का मौसम
गुल-ए-दिल करूँ जो अर्पण मिरा देवता न जाने

शब-ए-ग़म बदल गई है रुख़-ए-कहकशाँ की सूरत
तिरी याद से हैं रौशन मिरे ग़म के ख़ाने-ख़ाने

तिरी ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं तो वो मताअ'-ए-दिलकशी है
जिसे रात ने चुरा ली जिसे माँग ली घटा ने

तुझे पा के भी न पाना तुझे खो के फिर मचलना
यही उलझनों के फेरे यही जीने के बहाने

जो सितम है उन की फ़ितरत तो है सब्र अपनी आदत
दिया जोर-ओ-ज़ुल्म उन को हमें हौसला ख़ुदा ने

तिरी आँख के ये साग़र लब-ए-नाज़ के कटोरे
मिरे नाम आज कर दे ये सभी शराब-ख़ाने

मिरे दिल में ऐ 'फहीम' अब उठे हैं जो दर्द-ए-पैहम
मुझे याद आ रहे हैं वो शबाब के ज़माने