उर्दू शायरी · ग़ज़ल

udas ho gai shabnam jahan sahar aai

उदास हो गई शबनम जहाँ सहर आई

اداس ہو گئی شبنم جہاں سحر آئی

शायर: Faheem Jogapuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उदास हो गई शबनम जहाँ सहर आई
ग़म-ए-फ़िराक़ से फूलों की आँख भर आई

सहर के साथ शब-ए-ग़म गई मगर आई
हुई जो शाम तो घर अपने लौट कर आई

मुसाफ़िरान-ए-मोहब्बत को कुछ ख़बर ही नहीं
कि शाम कब गई आई तो कब सहर आई

उधार माँग के यूँ लाई ज़िंदगी ख़ुशियाँ
कि जैसे शाहिद-ए-बाज़ार माँग भर आई

तुम्हारा ग़म भी वहाँ ग़म नहीं रहा ऐ दोस्त
उदास जब कोई सूरत हमें नज़र आई

न आफ़्ताब को था चैन जुस्तुजू में तिरी
न नींद चाँद सितारों को रात भर आई

तिरे बग़ैर भी गुज़री है ज़िंदगी लेकिन
ख़ुशी की शाम न तो सुब्ह-ए-मो'तबर आई

रहे उदास तो हम मुद्दतों उदास रहे
हँसी जो आई तो फिर बात बात पर आई

पता न चल सका तारीक रास्तों का 'फहीम'
बिछड़ने वालों की अब तक न कुछ ख़बर आई