उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tu hi to nahin pighal raha hai

तू ही तो नहीं पिघल रहा है

تو ہی تو نہیں پگھل رہا ہے

शायर: Lateef Khan Mahfooz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तू ही तो नहीं पिघल रहा है
अपना भी लिबास जल रहा है

मैं चल भी दिया हूँ तुझ से मिल कर
तू ही कि अभी सँभल रहा है

रोने की तो कर रहा हूँ कोशिश
मौसम ही नहीं बदल रहा है

दरिया के बदल रहे हैं तेवर
मौजों का भी रुख़ बदल रहा है

घर अपना है फिर ये क्या सितम है
कि हुक्म किसी का चल रहा है

'महफ़ूज़' दिमाग़ आज अपना
कुछ और भी तेज़ चल रहा है