उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere qarib rahun ya ki dur jaun main

तिरे क़रीब रहूँ या कि दूर जाऊँ मैं

ترے قریب رہوں یا کہ دور جاؤں میں

शायर: Iftikhar Imam Siddiqi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे क़रीब रहूँ या कि दूर जाऊँ मैं
है दिल का एक ही आलम तुझी को चाहूँ मैं

मैं जानता हूँ वो रखता है चाहतें कितनी
मगर ये बात उसे किस तरह बताऊँ मैं

जो चुप रहा तो वो समझेगा बद-गुमान मुझे
बुरा भला ही सही कुछ तो बोल आऊँ मैं

फिर उस के ब'अद तअल्लुक़ में फ़ासले होंगे
मुझे सँभाल के रखना बिछड़ न जाऊँ मैं

मोहब्बतों की परख का यही तो रस्ता है
तिरी तलाश में निकलूँ तुझे न पाऊँ मैं