उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham be-kaif sahi sham hai Dhal jaegi

शाम बे-कैफ़ सही शाम है ढल जाएगी

شام بے کیف سہی شام ہے ڈھل جائے گی

शायर: Jaleel nizami8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाम बे-कैफ़ सही शाम है ढल जाएगी
दिन भी निकलेगा तबीअ'त भी सँभल जाएगी

इस क़दर तेज़ है दिल में मिरे उम्मीद की लौ
ना-उमीदी मिरे पास आई तो जल जाएगी

नर्म शानों पे न बिखराव घनेरी ज़ुल्फ़ें
इन घटाओं से शब-ए-तार दहल जाएगी

मस्त आँखों के दरीचों से न झाँका कीजे
जाम टकराएँगे मय-ख़्वारों में चल जाएगी

बन-सँवर कर मुझे समझाने न आओ वर्ना
फिर तमन्ना-ए-दिल-ए-ज़ार मचल जाएगी

माह-ए-नौ देखने तुम छत पे न जाना हरगिज़
शहर में ईद की तारीख़ बदल जाएगी

इतना सज-धज के अयादत को न आया कीजे
वर्ना कुछ सोच के ये जान निकल जाएगी

क्यों परेशाँ हो शब-ए-हिज्र की आमद पे 'जलील'
गर्दिश-ए-वक़्त है आज आई है कल जाएगी