उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sar kiya zulf ki shab ko to sahar tak pahunche

सर किया ज़ुल्फ़ की शब को तो सहर तक पहुँचे

سر کیا زلف کی شب کو تو سحر تک پہنچے

शायर: Gaffar Babar8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सर किया ज़ुल्फ़ की शब को तो सहर तक पहुँचे
वर्ना हम लोग कहाँ हुस्न-ए-नज़र तक पहुँचे

आज पलकों पे मिरी जश्न-ए-चराग़ाँ होगा
कितने अनमोल गुहर दीदा-ए-तर तक पहुँचे

मेरी रातों का अंधेरा भी दुआएँ देगा
इक सितारा जो उतर कर मिरे घर तक पहुँचे

कौन कहता है कि ख़ुर्शीद उतर कर आए
एक जुगनू ही मगर ख़ाक-बसर तक पहुँचे

जो भी आए तिरे कूचे में वो जाँ से गुज़रे
सर हथेली पे उठाए तिरे दर तक पहुँचे

है उसी साहिब-ए-मेराज का एहसान कि हम
ख़ाक हो कर भी मगर शम्स-ओ-क़मर तक पहुँचे

मैं अँधेरों का मुसाफ़िर हूँ उजालों का नक़ीब
किस की जुरअत है मिरी गर्द-ए-सफ़र तक पहुँचे

उँगलियाँ पहले क़लम करना पड़ेंगी 'बाबर'
फिर ये मुमकिन है क़लम हर्फ़-ए-हुनर तक पहुँचे