उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sandalin zamin apni marmarin makan apna

संदलीं ज़मीं अपनी मरमरीं मकाँ अपना

صندلیں زمیں اپنی مرمریں مکاں اپنا

शायर: Saadat Saeed4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

संदलीं ज़मीं अपनी मरमरीं मकाँ अपना
कौन मरना चाहेगा छोड़ कर जहाँ अपना

महर के तमाशे हैं माह के मनाज़िर हैं
रहना मुस्तक़िल होता इन के दरमियाँ अपना

'उम्र जिस की जितनी है नक़्श उस के उतने हैं
कौन फिर ज़माने में पाएगा निशाँ अपना

जिस पे हो सके रौशन नज्म-ए-ख़ुश-हक़ीक़त भी
ढूँढती फिरे ख़िल्क़त इक वो आसमाँ अपना