उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saqi gaya hai ruTh ke humse hazar-haif

साक़ी गया है रूठ के हम से हज़ार-हैफ़

ساقی گیا ہے روٹھ کے ہم سے ہزار حیف

शायर: Qadr Aurangabadi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साक़ी गया है रूठ के हम से हज़ार-हैफ़
आती है क्यों तू धूम से अब के बहार हैफ़

कल शोख़ से दो-चार मैं हो राह में कहा
किस का मले हो हात में ख़ूँ को निगार हैफ़

कहने लगा कि कुछ है तुझे सूझता नहीं
अंधे ये है हिना तू न कह बार-बार हैफ़

नें तो क़सम ख़ुदा की मैं समझूँगा बे-तरह
कुछ भी शुऊ'र है तुझे ऐ बद-शिआ'र हैफ़

मैं ने कहा कि बख़्शो मियाँ लो ख़ुदा का नाम
अच्छे हो तुम भी रोज़ हो लेकिन हज़ार-हैफ़

मजनूँ-सिफ़त फिरूँ हूँ मैं सहरा में तो भी हाए
ऐ लैला-वश किया नहीं बोस-ओ-कनार हैफ़

रोया हूँ बस-कि हिज्र में आँखें हुईं सफ़ेद
मुद्दत गुज़र गईं न मिला तू तो यार हैफ़

उस बे-वफ़ा नें सुन के ग़ज़ब से कहा मुझे
किस दिन किया था मुझ पे दिल अपना निसार हैफ़

मैं तुझ को जानता ही नहीं हूँ ख़ुदा की सों
आवे है मुझ को होने से तेरे दो-चार हैफ़

वक़्ते कि तिल-रुख़ान-ए-जहाँ का ये रंग हो
फिर ज़िंदगी जहान में कीजे हज़ार-हैफ़