उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raushni ka qalib jab tirgi mein Dhalta hai

रौशनी का क़ालिब जब तीरगी में ढलता है

روشنی کا قالب جب تیرگی میں ڈھلتا ہے

शायर: Yahya Khalid5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रौशनी का क़ालिब जब तीरगी में ढलता है
ख़्वाहिशों के सीने में मेरा दिल मचलता है

रेगज़ार सोचों का सूरजों की ज़द में है
जिस्म आरज़ूओं का हौले हौले जलता है

जब भी कोई हमराही साथ छोड़ जाता है
मुद्दतों ख़याल उस का साथ साथ चलता है

उम्र भर की क़िस्मत कब इतना तो ठहर जाता
जितना एक मुफ़्लिस के घर चराग़ जलता है

इंतिज़ार का सहरा फैलता ही जाता है
इक सराब बन कर वो रास्ते बदलता है