उर्दू शायरी · ग़ज़ल

phir apne-ap se usko hijab aata hai

फिर अपने-आप से उस को हिजाब आता है

پھر اپنے آپ سے اس کو حجاب آتا ہے

शायर: Nadir Siddiqui6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फिर अपने-आप से उस को हिजाब आता है
थिरकती झील पे जब माहताब आता है

दिखाइए न हमें आप मौसमी आँसू
कि ये हुनर तो हमें बे-हिसाब आता है

वो जिस तरीक़ से उस ने सवाल दाग़ा है
उसी तरह का मुझे भी जवाब आता है

तो बारिशों से शिकायत सी होने लगती है
गुलाब सा जो कोई ज़ेर-ए-आब आता है

मैं अपनी आँख में शबनम उतार लेता हूँ
वो अपनी आँख में जब ले के ख़्वाब आता है

अभी तो नाम भी अपना नहीं मिला मुझ को
अभी तो नाम से पहले जनाब आता है