उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na jaane kaun sa manzar sadaen deta hai

न जाने कौन सा मंज़र सदाएँ देता है

نہ جانے کون سا منظر صدائیں دیتا ہے

शायर: Rabia Basri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न जाने कौन सा मंज़र सदाएँ देता है
मैं पीली धूप वो नीली हवाएँ देता है

किसी के चेहरे पे गर्द-ए-मलाल देखती हूँ
ख़ुदा कभी न कभी तो सज़ाएँ देता है

ख़याल-ए-यार ने आँखें हमारी नम रक्खीं
जमाल-ए-यार पलट के जफ़ाएँ देता है

तिरे मज़ार से वीरे! महक सी आती है
तू मुझ से दूर भी रह कर दुआएँ देता है

ग़ुबार-ए-ग़म है शब-ए-हिज्र और मैं कमली
फ़िराक़-ए-यार भी क्या क्या अदाएँ देता है

सफ़र की धूल थकन आबले शिकस्ता बदन
ये शे'र यूँ नहीं होता बलाएँ देता है

तू जिस मक़ाम पे बैठी है राबिया 'बसरी'
फ़क़त ये नाम ही तुझ को ज़ियाएँ देता है