उर्दू शायरी · ग़ज़ल

musalsal thi meri KHana-badoshi

मुसलसल थी मिरी ख़ाना-बदोशी

مسلسل تھی مری خانہ بدوشی

शायर: Chandni Pandey6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुसलसल थी मिरी ख़ाना-बदोशी
बहुत चुभती रही ख़ाना-बदोशी

हर इक महफ़िल में उस को ढूँडने से
मिली नज़रों को भी ख़ाना-बदोशी

मैं घर में रह के भी घर में नहीं थी
अजब सी थी कोई ख़ाना-बदोशी

कभी तो आ के मुझ में जज़्ब हो जा
फ़ना कर दे मिरी ख़ाना-बदोशी

बहुत कुछ टूटता है पहले अंदर
नहीं मिलती यूँ ही ख़ाना-बदोशी

मैं हर इक ज़ाविए से सोचती हूँ
मुझे क्यूँकर मिली ख़ाना-बदोशी