उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe to yun bhi isi rah se guzarna tha

मुझे तो यूँ भी इसी राह से गुज़रना था

مجھے تو یوں بھی اسی راہ سے گزرنا تھا

शायर: Parkash Fikri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे तो यूँ भी इसी राह से गुज़रना था
दिल-ए-तबाह का कुछ तो इलाज करना था

मिरी नवा से तिरी नींद भी सुलग उठती
ज़रा सा इस में शरारों का रंग भरना था

सुलगती रेत पे यादों के नक़्श क्यूँ छोड़े
तुझे भी गहरे समुंदर में जब उतरना था

मिला न मुझ को किसी से ख़िराज अश्कों में
हवा के हाथों मुझे और कुछ बिखरना था

उसी पे दाग़ हज़ीमत के लग गए देखो
यक़ीं की आग से जिस शक्ल को निखरना था

मैं खंडरों में उसे ढूँडता फिरा 'फ़िक्री'
मगर कहाँ था वो आसेब जिस से डरना था