उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere aangan mein pili dhup jab diwar se utri

मिरे आँगन में पीली धूप जब दीवार से उतरी

مرے آنگن میں پیلی دھوپ جب دیوار سے اتری

शायर: Parkash Fikri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे आँगन में पीली धूप जब दीवार से उतरी
अंधेरे की सियह चादर न जाने और क्यों फैली

जलाया ख़्वाहिशों ने रात की तन्हाई में मुझ को
बहुत ही दूर थी पर लज़्ज़तों की नर्म-रौ नद्दी

हवा का हाथ भी अब जिस्म तेरा गुदगुदाएगा
न सो ऐसी रुतों में खोल कर यूँ रात को खिड़की

ये बूढ़ा पेड़ बेचारा ख़मोशी को तरसता है
सदा रहती है इस पे गूँजती चहकार चिड़ियों की

तिरा रंगीन पैकर घूमता है आँख में जैसे
थिरकती डोलती शाख़ों पे उड़ती शोख़ सी तितली

किसी करवट न चैन आया न आई नींद ही मुझ को
बड़ी ग़मनाक ग़म-अंगेज़ कल की रात थी 'फ़िक्री'