उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main isi soch mein rahta hun kidhar jati hai

मैं इसी सोच में रहता हूँ किधर जाती है

میں اسی سوچ میں رہتا ہوں کدھر جاتی ہے

शायर: Hadi Mustafabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं इसी सोच में रहता हूँ किधर जाती है
तेरी ख़ुशबू जो मुझे छू के गुज़र जाती है

ख़त के बदले उन्हें कुछ फूल पहुँच जाते हैं
मेरी तहरीर ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर जाती है

मुझ को आवारा-निगाही का तू इल्ज़ाम न दे
तेरे धोके में हसीनों पे नज़र जाती है

इज़्तिराब-ए-निगह-ए-शौक़ पे आती है हँसी
तेरे होते जो नज़र जानिब-ए-दर जाती है

थे तो ग़ुस्से में मगर हँस भी दिए हैं ऐसे
फ़स्ल-ए-गुल जाते हुए जैसे ठहर जाती है

मैं जिसे कहने को बेचैन हूँ उन से 'हादी'
जाने क्यों ध्यान से वो बात उतर जाती है