उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mahakte se lamhon ki mahfil saji ho

महकते से लम्हों की महफ़िल सजी हो

مہکتے سے لمحوں کی محفل سجی ہو

शायर: Vikas Shah Musafir4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

महकते से लम्हों की महफ़िल सजी हो
निगाहों में उल्फ़त की इक रौशनी हो

जहाँ लब ये चुप हों नज़र कह रही हो
वहाँ भी तसव्वुर में कुछ ज़िंदगी हो

वो रस्ते वो बातें वो माज़ी के क़िस्से
यहाँ हर तरफ़ हर ज़बाँ शा'इरी हो

कभी जो हँसी में छुपा दर्द पाएँ
वही तो हमारे दिलों की ख़ुशी हो