उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mah-ru nikle hai nit ujli tarah

माह-रू निकले है नित उजली तरह

ماہ رو نکلے ہے نت اجلی طرح

शायर: Obaidullah Khan Mubtala9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

माह-रू निकले है नित उजली तरह
इस सबब रौशन है दिल पुतली तरह

सुन मिरा रोना हुआ टुक मेहरबाँ
यार ने बरसात में बदली तरह

ग़म्ज़ा की शमशीर चमकाता है वो
क्यूँ न हो दिल मुज़्तरिब बिजली तरह

मच्छी देता नईं मुझे वो बहर सूँ
छोड़ दी उस ने मगर अगली तरह

क्यूँ मिरे आगे अकड़ चलता है आज
मुझ को भूली नईं तिरी पिछली तरह

सर-निगूँ है सर्व-क़द की फ़िक्र में
बेद ने मजनूँ की सब लैली तरह

इश्क़ ने आ कर पछाड़ा दिल कतीं
गुर्ग नीं आहू सीं की जंगली तरह

मुझ दिवाने की नज़र में ऐ परी
ताश और कमख़ाब है कमली तरह

गाली दे कर मुस्कुराता है वो शोख़
'मुबतला' अब यूँ नई निकली तरह