उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya lutf zindagi ka uThane lage hain log

क्या लुत्फ़ ज़िंदगी का उठाने लगे हैं लोग

کیا لطف زندگی کا اٹھانے لگے ہیں لوگ

शायर: Lateef Adeebi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या लुत्फ़ ज़िंदगी का उठाने लगे हैं लोग
दिन में भी अब चराग़ जलाने लगे हैं लोग

आईना ज़िंदगी को दिखाने लगे हैं लोग
मेरी ग़ज़ल को सरक़ा बताने लगे हैं लोग

हर जा पे ज़र्फ़ अपना दिखाने लगे हैं लोग
चादर से अपनी पाँव बढ़ाने लगे हैं लोग

तारीख़-ए-नौ निसाब में आई है इस तरह
माज़ी के सारे नक़्श मिटाने लगे हैं लोग

दीवानगी की हद से भी आगे निकल गए
मरहूम को ख़ुतूत लिखाने लगे हैं लोग

अम्न-ओ-अमाँ की पैदा हो इस मुल्क में फ़ज़ा
क्यों नफ़रतों के पेड़ उगाने लगे हैं लोग

आई न रास जब उन्हें शहरों की ज़िंदगी
सहरा की सम्त देखिए जाने लगे हैं लोग

अशआ'र मेरी ग़ज़लों के छूने लगे हैं दिल
अपने दिलों में मुझ को बिठाने लगे हैं लोग

ये भी तो ऐ 'लतीफ़' सियासत की देन है
सर पर गधों के सींग उगाने लगे हैं लोग