उर्दू शायरी · ग़ज़ल

khiDki kholo kuchh to yahan bhi taza narm hawa aae

खिड़की खोलो कुछ तो यहाँ भी ताज़ा नर्म हवा आए

کھڑکی کھولو کچھ تو یہاں بھی تازہ نرم ہوا آئے

शायर: Ibn-ul-Hasan6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

खिड़की खोलो कुछ तो यहाँ भी ताज़ा नर्म हवा आए
मंज़र सहन-ए-चमन का उभरे बू-ए-दर्द-रुबा आए

बे-जाँ फ़न में जान सी आए ज़ख़्म-ए-तमन्ना ताज़ा हो
याद में रंग हिना का लहके रक़्स में बाद-ए-सबा आए

माह-गज़ीदा रात है साकित जैसे कोई आईना
ओस के सब्ज़े पर गिरने की सन्नाटे में सदा आए

फ़ज़्ल-ए-ख़िज़ाँ के सूखे पत्ते हाँप रहे हैं साए में
साया अपने तह-ख़ानों में जाए उन्हें पहुँचा आए

पहरों दिल से बातें कर के चैन से बैठे हैं ऐसे
जैसे जो कुछ भी कहना था दुनिया-भर को सुना आए

नहर पे साया-बार शजर के जाल से मौजें उलझी हैं
कोई 'हसन' उस उलझा दे कोई जाए ज़रा सुलझा आए