उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHayal-o-fikr ka sadqa utarte rahiye

ख़याल-ओ-फ़िक्र का सदक़ा उतारते रहिए

خیال و فکر کا صدقہ اتارتے رہئے

शायर: Faheem Jogapuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़याल-ओ-फ़िक्र का सदक़ा उतारते रहिए
लहू पिला के ग़ज़ल को सँवारते रहिए

ग़ुरूर-ए-फ़त्ह में दुश्मन ज़रूर डूबेगा
है जीतना तो अभी जंग हारते रहिए

निगाह-ओ-दिल से ये कहती है आइने की कशिश
कहीं न देखिए हम को निहारते रहिए

ग़म-ओ-अलम की तरह दुख भरे दिनों जैसा
किसी बहाने हमें भी गुज़ारते रहिए

पुरानी चोट की यादों को ले के आँखों में
जबीं पे और लकीरें उभारते रहिए

अकेले-पन से लगे डर तो लाज़मी है 'फहीम'
अँधेरी रात में ख़ुद को पुकारते रहिए