उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHafif lab pe tabassum ruka ruka sa lage

ख़फ़ीफ़ लब पे तबस्सुम रुका रुका सा लगे

خفیف لب پہ تبسم رکا رکا سا لگے

शायर: Faheem Jogapuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़फ़ीफ़ लब पे तबस्सुम रुका रुका सा लगे
कि कोई गुंचा-ए-नौ-रस खिला खिला सा लगे

जिधर भी देखिए सब कुछ भला भला सा लगे
ये तज्रबा तो अजब ही नया नया सा लगे

वो जब रुके तो ज़माने की चाल बढ़ जाए
वो जब चले तो ज़माना रुका रुका सा लगे

अकड़ के बात करे जब ज़मीं से बात करे
वो आसमान जो हर-सू झुका झुका सा लगे

तिरे भी शहर-ए-तमन्ना में आग लग जाए
मिरा जो आलम-ए-इम्काँ बुझा बुझा सा लगे

जो रात आए वो सहमी हुई सी रात आए
जो आए दिन तो वो दिन भी डरा डरा सा लगे

हैं साथ साथ मगर दिल जुदा जुदा ले कर
वो एक घर जहाँ आँगन बटा बटा सा लगे

जिसे समझते हो भरपूर ज़िंदगी से 'फहीम'
क़रीब जाओ तो कितना लुटा लुटा सा लगे