उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo ban-sanwar ke wo ek mah-ru nikalta hai

जो बन-सँवर के वो इक माह-रू निकलता है

جو بن سنور کے وہ اک ماہ رو نکلتا ہے

शायर: Aadil Rasheed5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो बन-सँवर के वो इक माह-रू निकलता है
तो हर ज़बान से बस अल्लाह-हू निकलता है

हलाल रिज़्क़ का मतलब किसान से पूछो
पसीना बन के बदन से लहू निकलता है

ज़मीन और मुक़द्दर की एक है फ़ितरत
कि जो भी बोया वही हू-ब-हू निकलता है

ये चाँद रात ही दीदार का वसीला है
ब-रोज़-ए-ईद ही वो ख़ूब-रू निकलता है

तिरे बग़ैर गुलिस्ताँ को क्या हुआ 'आदिल'
जो गुल निकलता है बे-रंग-ओ-बू निकलता है