उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis ke hathon mein hua tha sang-rezon ka shikar

जिस के हाथों में हुआ था संग-रेज़ों का शिकार

جس کے ہاتھوں میں ہوا تھا سنگریزوں کا شکار

शायर: Badrul Hasan Badar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस के हाथों में हुआ था संग-रेज़ों का शिकार
आज वो भी हो गया अपने गुनाहों का शिकार

और कितने दिन मिरी नज़रों को तुम दोगे फ़रेब
और कितने दिन रहूँगा मैं तिलिस्मों का शिकार

बद-गुमाँ जिस से रहा करती थी सूरज की किरन
हो गया वो पेड़ भी काली घटाओं का शिकार

चल पड़े हैं लोग मुझ को ले के सूली की तरफ़
आख़िरश मैं हो गया अपने उसूलों का शिकार

अपनी शोहरत का मुझे उस वक़्त अंदाज़ा हुआ
शख़्सियत मेरी हुई जब नुक्ता-चीनी का शिकार

सर कटी लाशें मिलेंगी तुम को हर इक मोड़ पर
रौशनी हो जाएगी जिस दम अँधेरों का शिकार

'बद्र' तेरा शुक्रिया कि तू भी मेरे साथ है
मैं अकेला ही नहीं झूटी उमीदों का शिकार