उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis ka badan gulab tha wo yar bhi nahin

जिस का बदन गुलाब था वो यार भी नहीं

جس کا بدن گلاب تھا وہ یار بھی نہیں

शायर: Parkash Fikri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस का बदन गुलाब था वो यार भी नहीं
अब के बरस बहार के आसार भी नहीं

पेड़ों पे अब भी छाई हैं ठंडी उदासियाँ
इम्कान जश्न-ए-रंग का इस बार भी नहीं

दरिया के इल्तिफ़ात से इतना ही बस हुआ
तिश्ना नहीं हैं होंट तो सरशार भी नहीं

राहों के पेच-ओ-ख़म भी उसे देखने का शौक़
चलने को तेज़ धूप में तय्यार भी नहीं

बिछड़े हुओं की याद निभाते हैं जान कर
वर्ना किसी को भूलना दुश्वार भी नहीं

जितना सितम-शिआर है ये दिल ये अपना दिल
उतने सितम-शिआर तो अग़्यार भी नहीं

अहल-ए-हुनर के बाब में उस का भी ज़िक्र हो
'फ़िक्री' को ऐसी बात पे इसरार भी नहीं